महू तहसील के ग्रामीण इलाकों में संचालित आलू चिप्स कारखानों की लापरवाही अब गंभीर पर्यावरणीय संकट का रूप लेती जा रही है। नियमों के बावजूद अधिकांश इकाइयां बिना ईटीपी (इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) के ही संचालित हो रही हैं और स्टार्च युक्त दूषित पानी खुले में बहाया जा रहा है। इसका सीधा असर भूजल, नालों और नदियों पर पड़ रहा है, जिससे आसपास के रहवासी बदबू और प्रदूषण से परेशान हैं।
निर्देश कागज़ों तक सीमित
प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद कारखाना संचालक नियमों को नजरअंदाज कर रहे हैं। कई जगह ईटीपी के नाम पर सिर्फ गड्ढे खोदकर औपचारिकता पूरी कर दी गई है, जिससे दूषित पानी सीधे जमीन में रिसकर भूजल को नुकसान पहुंचा रहा है।
करोड़ों का कारोबार, लेकिन शोधन पर लापरवाही
महू तहसील में करीब 150 से अधिक चिप्स कारखाने सक्रिय हैं, जो सालाना लगभग 125 करोड़ रुपये का व्यापार करते हैं। इसके बावजूद अपशिष्ट जल के शोधन को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई जा रही।
हर दिन हजारों लीटर दूषित पानी
एक टन आलू की प्रोसेसिंग में लगभग 3750 लीटर पानी उपयोग होता है, जिसमें से करीब 3600 लीटर दूषित पानी निकलता है। यह पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के नालों और नदियों में छोड़ा जा रहा है, जिससे जल गुणवत्ता तेजी से गिर रही है और झाग व दुर्गंध की समस्या बढ़ रही है।
सीजन में बढ़ता संकट
जनवरी से जुलाई तक चलने वाले इस उद्योग में जनवरी से मई के बीच उत्पादन चरम पर होता है। इस दौरान अपशिष्ट की मात्रा भी कई गुना बढ़ जाती है, जिससे प्रदूषण की स्थिति और गंभीर हो जाती है।
हवा भी हो रही जहरीली
कारखानों में ईंधन के रूप में लकड़ी का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, जिससे धुआं और वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। वहीं अवैध लकड़ी की सप्लाई पर भी प्रभावी नियंत्रण नहीं है, जिससे वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।




